Sunday, August 11, 2013

कितने लोग एक टाटा मैजिक पर बैठ सकते हैं?









यह दृश्य नोएडा-ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेसवे का है। टाटा मैजिक पर बैठे लोग नोएडा से ग्रेटर नोएडा जा रहे हैं। ऐसा नहीं है कि पुलिस इस एक्सप्रेसवे पर नहीं रहती। शायद ऐ स्तिथी मान्य है। इस में कोई खतरा नहीं दीखता शायद!!

आप लोग देखे और बताएं की आप को कैसा लगता है। इंगलिश में भी कमेन्ट कर सकते हैं।

Monday, January 7, 2013

नोएडा की सडकें और हम

मैं जब भी नोएडा की सड़क पर निकलता हूँ तो लेन कल्चर, पैदल पार का रास्ता और ट्रैफिक लाइट का उलंघन बहुत ही सताता है। उस समय दुःख और ही बढ जाता है, जब वहा  पर खड़ी पुलिस से कहिये कि कृपया देखिये क्या हो रहा है, तो जबाब मिलता है की कोई सुनता नहीं।

लेन कल्चर
कार चलाते समय कोई एक लेन पर न चले तो समझ में आता है परन्तु दो लेन में लाइन को बीच में रख कर कोई गाडी चला रहा हो,  तो समझ में नहीं आता कि क्यों? सबसे बड़ी परेशानी
तब होती है जब ट्रैफिक लाइट पर टर्निंग वाला व्यक्ति अंदर लेन के बजाये बाई वाली लेन से दाहिने मुड रहा होता है दूसरो की गाडियों को रोक कर। पुलिस भी खड़ी है। कई बार समझ में नहीं आता कि लोगो को इन सबका ज्ञान नहीं है या किसी को परवाह नहीं है।

पैदल पार का रास्ता
दो तरीके की कमी दिखती है इस सन्दर्भ में। एक तो सड़क की डिजाईन और दूसरी गाड़ी चलाने वालो की मानसिकता। दूसरे को सुधरने के पहले पहले को ठीक करना बहुत जरूरी है।
सफ़ेद पट्टी जो ट्रैफिक लाइट पर लगी रहती है, अगर उसे देखे तो दोनों तरफ उसमे रुकावट दिखाई देती है। कोई भी पैदल पार करने वाला व्यक्ति उस पर से आसानी से सड़क पार नहीं कर सकता। अगर असानी उस राश्ते पर नहीं है तो कोई क्यों उपयोग करेगा।
दूसरा गाडी चलाने वाले जल्दी से जल्दी ट्रैफिक लाइट पार करने में चक्कर में सफ़ेद पट्टी का ध्यान नहीं देते, उसी पर गाडी खड़ी कर देंगे। पुलिस हो या ना हो, किसी को कोई फरक नहीं पड़ता।

ट्रैफिक लाइट का उलंघन
रेड लाइट (लाल बत्ती) रहते बहुत लोगो को पार करते देख सकते है ट्रैफिक लाइट पर। अगर आप बीच में आ जाए तो ऐसे देखेगे की जैसे उन्होंने नहीं पर मैंने गलती कर दी हो। कई बार पुलिस रहने पर लोग संकोच करते दिखते है पर कुछ लोग तो इतने ढीठ है कि पुलिस की भी परवाह नहीं करते। आखिर क्यों?

Sunday, January 6, 2013

परहित सरिस धरम नहि ...

परहित सरिस धरम नहि ... इन शब्दों का मूल्य किताबों के बाहर शायद ही रह गया है।
पिछले दिनों मुझे मेट्रो में चलने का मौका मिला। नोएडा से गुडगाँव जाना था तीन दिन    लगातार। बोटोनिकल गार्डन से हुडा सिटी सेन्टर तक। सीट पाने की यानि बैठने की चाह लगभग सभी लोगो में इतनी प्रबल दिखी की किसी भी सूरत में सीट लेनी है। कभी कभी तो ऐ चाह इतनी प्रबल थी की पांच की सीट पर छह या सात लोग भी बैठ जायेगे। बैठने वाला व्यक्ति  किसी भी तरीके से थका नहीं लग रहा होता। कई बार इच्छा हुई कि मै अपनी सीट उन्हें दे दूं पर हमेशा डरता रहा कि कोई और ही ना बैठ जाए।